Deepak Dobhal

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आन्दोलन लोकतंत्र के लिए शाप या अभिशाप ?

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आन्दोलन लोकतंत्र के लिए शाप या अभिशाप आजकल  यही बात  सभी के जहन मे आ रही है. इन दिनो लगातार  बढ़ रहे अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को देखते हुए… हर तरफ से कोई ना कोई अपनी अपनी आवाज मे कुछ  ना कुछ कह रहा है..

लोगो का इस तरह से खुल कर अपनी आवाज बुलंद करना शुरू हुआ पिछले साल दिसंबर में हुई दिल्ली गैंग रेप के बाद … जिसमे लोगो ने कैण्डल मार्च से लेकर हिंसक हंगामे तक अपना विरोध प्रकट किया .

विरोध एक ऐसा शब्द या यूं कहिए एक ऐसी धारणा  जो कि तब से शुरू हुई जब से इंसान दुनिया में आया और प्रगति करने लगा. तब से विऱोध की ये धारणा इंसानी दिमागी में बैठी है…जो कि कभी क्रान्ति का काम करती है और कभी बगावत का

भारत का इतिहास विऱोधों का गवाह रहा है..कभी मुगलों की आजादी के लिए… और कभी अंग्रेजों से आजादी के लिए.. क्योंकि विरोध से ही आन्दोलन पैदा होता है… और अंग्रोजों के विरोध में भारत को आजाद कराने के लिए कई आन्दोलन हुए…आखिरकार जब भारत 1947 में एक आजाद लोक तंत्र बना तो सभी को लगा कि अब ये विरोध की धारणा बदल जायेगी..जैसे ही भारत आजाद हुआ तो इस विऱोध ने भारत पाकिस्तान को अलग कर दिया.. बाद मे आजाद भारत में इन्द्रा गांधी के द्वारा लगाई गई emergency का विरोध को आन्दोलन का नाम दिया गया.. इस विरोध को उसी आधार पर आन्दोलन का नाम दिया गया जिस आधार पर गांधी जी ने अंग्रेजो के विरोध में सत्यग्रह किया था… इस विरोध को सत्यग्रह आन्दोलन कहा गया.. आपातकाल  के विरोध में जे.पी. आन्दोलन के बाद तो जैसे भारत में आन्दोलनो का झड़ी लग गई.. भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आन्दोलन करने वाला या यूं कहे आन्दोलन झेलने वाला देश बन गया… और ये विरोध आज तक जारी है.. कभी ये विरोध भष्ट्राचार के खिलाफ अन्ना के आन्दोलन के रूप दिखता है… तो कभी नक्सली आन्दोलन के रूप में… कभी ये विरोध अलग राज्य की मांग के रूप में दिखता है.. तो कभी पर्यावरण बचायो आन्दोलन.. तो कभी महिला सुरक्षा से लेकर बीजली पानी, सड़क दूर्घटना, प्रशासन के खिलाफ लापरवाही तक के आन्दोलन आये दिन सुनायी देते हैं…. ये आन्दोलन लोकतांत्रिक बुनियाद के लिए जरूरी भी  होते  हैं…. क्योंकि इससे सत्ताधारीयों को  याद रहता है कि असली सत्ता आम लोगों के पास होती है.. और जनता मे ऐसे भी लोग है जो की हुकमारनो पर नजर रखें हैं..

मगर इस स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का एक ओर रूप भी है…जब आन्दोलन कारी इस लचीले लोकतंत्र का फायदा उठाकर इस विरोध प्रदशन को एक उग्र रूप देते हैं… जो कि आये दिन होता रहता है…. कभी सड़को पर तोड़ फोड़ तो कभी भारत बंद जिसमें लोग नारे बाजी से लेकर  पथराव और बम से लेकर बन्दूक तक का उपयोग करते हैं… ये विरोध का एक छोटा सा रूप है  मगर जब ये विरोधावाद बड़ जाता है तो कभी आंतकवाद का रूप ले लेता है तो कभी नक्सलवाद का… जो कि आज कल सबसे भयानक प्रदर्शन है अपना विरोध करने के लिए..इसके पीछे अलग अलग तर्क दिये जाते हैं… कोई अलग कश्मीर की मांग कर रहा है तो कोई आजाद भारत में अपने आप को आजाद नहीं मानता….इसमें मुझे गढ़चिरौली  के एक लोक नायक की कुछ लाइने याद आ रही है… सुना है कि आजादी मिल गई है कुछ 50 – 60 साल पहले वह लाल किले से तो चला था पर  पता नहीं कहां खो गया, उसको बहुत ढूंढा मगर अभी तक मिला नही, देखा नही आज तक कैसा है गोरा है कि काला, लंबा है या छोटा, भाई किसी को अगर मिल जाये तो हमारे गांव में जरूर भेज देना किसी ने आज तक आजादी देखी नही है….

ये लाइन लोक तंत्र का एक ऐसा रूप दिखाती है जहां लोग अपने आपको आजाद नही मानते हैं…और  एक ऐसा रूप भी है जंहा लोग इतना कुछ बोल जाते है कि जैसे सारी आजादी इन्ही को मिली हो… चाहे शिवसेना का मराठी राग हो, राज ठाकरे का यू. पी. बिहार विरोधी भाषण हो, और किसी का हिन्दू विरोधी राग तो किसी का मूस्लीम विरोधी भाषण ये दर्शाता है कि हमारें समाज में हर किसी को बोलने और विरोध करने का हक है…. किसी के बयान, लेख, किताब या फिर फिल्म का विरोध और उसके बाद पाबंदी इसलिए लगाई जाती है क्योकि इससे किसी खास वर्ग या व्यकित को आहत होता है…

आखिर कार लोक तंत्र में किस तरह का विरोध होना चाहिए.. यह विरोध या आन्दोलन लोकतंत्र के लिए खतरा बने या मजबूती.. ये एक बहुत बड़ा सवाल और चिन्ता का विषय है हमारे समाज के लिए…

इसमे सिर्फ सरकार कोई ही कदम नहीं उठाने हैं बल्कि आम से लेकर खास लोग जो विरोध कर रहे हों या फिर जिनके खिलाफ विरोध हो रहा हो जरूरी है  संयम और सूझ बूझ के साथ अहिंसात्मक रूप अपनाना

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